पृष्ठ:निर्मला.djvu/२७१

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निर्मला
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निर्मला-बारह! बारह बज गए! इतनी देर तो कभी न करते थे। तो अब कब तक उनकी राह देखोगे! दोपहर को भी तो कुछ नहीं खाया था। ऐसा सैलानी लड़का मैंने नहीं देखा।

मुन्शी जी-जी तुम्हें बहुत दिक़ करता है,क्यों?

निर्मला-देखिए न,इतनी रात गई; और घर की सुध ही नहीं।

मुन्शी जी-शायद यह आखिरी शरारत हो।

निर्मला-कैसी बातें मुंह से निकालते हैं। जायँगे कहाँ? किसी यार दोस्त के घर पड़ रहे होंगे।

मुन्शी जी-शायद ऐसा ही हो। ईश्वर करे ऐसा ही हो।

निर्मला-सबेरे आवें; तो ज़रा तम्बीह कीजिएगा।

मुन्शी जी-खूब अच्छी तरह करूँगा।

निर्मला-चलिए खा लीजिए,देर बहुत हुई।

मुन्शी जी-सवेरे उसकी तम्वीह करके खाऊँगा। कहीं न आया, तो तुम्हें ऐसा ईमानदार नौकर कहाँ मिलेगा।

निर्मला ने ऐंठ कर कहा-तो क्यामैंने भगा दिया?

मुन्शी जी-नहीं, यह कौन कहता है? तुम उसे क्यों भगाने लगी? तुम्हारा तो काम करता था। शामत आ गई होगी।

निर्मला ने और कुछ नहीं कहा। वात बढ़ जाने का भय था। भीतर चली आई। सोने को भी न कहा। जरा देर में भुङ्गी ने अन्दर से किवाड़ भी बन्द कर दिए!