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[ Part I Ch. 4
परमार्थसोपान
6. TULSIDASA'S APOSTROPHE TO THE TONGUE.
काहे न रसना रामहिं गावहि ॥ टे ॥
निस दिन पर अपवाद वृथा कृत,
रटि रटि राग बढ़ावहि ॥१॥
नर मुख सुन्दर मन्दिर पावन,
बसि जनि ताहि लजावहि ।
ससि समीप रहि त्यागि सुधा कत,
रविकर जल कहँ धावहि ॥२॥
काम कथा कलि कैरव चन्दिनि,
सुनत स्रवन दे भावहि |
तिन्हहिं हटकि, भजि हरि कल कीरति,
करन कलंक नसावहि ॥३॥
जातरूप मति, युक्ति रुचिर मनि,
रचि रचि हार बनावहि ।
सरन सुखद, रविकुल- सरोज रबि,
राम नृपहिं पहिरावहि ॥४॥
बाद विवाद स्वाद तजि, भजि हरि,
सरस चरित चित लावहि ।
तुलसिदास भव तरहि, तिहुँ पुर,
तू पुनीत जस पावहि ॥५॥