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पृष्ठ:परमार्थ-सोपान.pdf/१८६

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[ Part I Ch. 4
परमार्थसोपान


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कोरी साल न छाँड़ै रे,
सब घावर कौं काढ़ै रे ॥ टे ॥

प्रेम प्राग लगाई धागै,
तत्त तेल निज दीआ ।
एक-मना इस आरम्भ लागा,
ज्ञान राछ भर लीया ॥ १ ॥

नाम नली भरि बुण कर लागा,
अन्तर गति रंग राता ।
ताणै बाणै जीव जुलाहा,
परम तत्व सों माता ॥ २ ॥

सकल शिरोमणि बुनै बिचारा,
सान्हा सूत न तोड़ै ।
सदा सचेत रहै लौ लागा,
ज्यों टूटे त्यों जोड़ै ॥ ३ ॥

ऐसे तनि बुनि गहर गजीना,
साई के मन भावै ।
दादू कोरी कर्ता के संगि
बहुरि न इहि जग आवै ॥ ४ ॥