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परीक्षा गुरु
११८
 

"मतलब तो आपका और मेरा लाला साहब खुद समझते होंगे परन्तु मुझको यह बात कुछ नई-नई सी मालूम होती है” मास्टर शिंभूदयाल ने सन्देह बढ़ाने के वास्ते कहा.

"सीधी बात को बे मतलब पहेली बनाना क्या ज़रूरी है? जो कुछ कहना हो साफ़ कहो”

"अच्छा! सुनिये” लाला मदनमोहन कहने लगे “लाला हरकिशोर के स्वभाव को तो आप जानते ही हैं आपके और उनके बीच बचपन से झगड़ा चला आता-"

"वह झगड़ा भी आप ही की बदौलत है परन्तु खैर! इस समय आप उसका कुछ विचार न करें अपना वृत्तान्त सुनाएँ और औरों के काम में अपनी निज की बातों का सस्बन्ध मिलाना बड़ी अनुचित बात है? ” लाला ब्रजकिशोर ने कहा.

"अच्छा! आप हमारा वृत्तान्त सुनिये" लाला मदनमोहन कहने लगे "कई दिन से लाला हरकिशोर रूठे रूठे से रहते थे. कल बेसबब हरगोविन्द से लड़ पडे उसकी जिद पर आप पांच-पांच रुपये के घाटे से टोपियाँ देने लगे. शाम को बाग में गए तो लाला हरदयाल साहब से वृथा झगड़ पडे़, आज यहां आए तो मुझको और चुन्नी लाल को सैंकड़ों कहनी न कहनी सुना गए!”

"बेसबब तो कोई बात नहीं होती आप इसका असली सबब बताइये? और लाला हरकिशोर पांच-पांच रुपये के घाट पर प्रसन्नता से आपको टोपियाँ देते थे तो आपने उनमें से दस पांच क्यों नही ले लीं? इनमें आप से आप हरकिशोर पर बीस-पच्चीस रुपये का जुर्माना हो जाता” लाला ब्रजकिशोर ने मुस्कुरा कर कहा.