पृष्ठ:परीक्षा गुरु.djvu/१९१

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साहसी पुरुष.
 

हैं परन्तु युक्ति सै काम लेनें के लायक हैं हां! ऐसे मनुष्यों सै काम लेनें मैं उन्का मन बराबर बढ़ाते जांय तो आगै चल कर काबू सै बाहर होजानें का भय रहता है इसलिये कोई बुद्धिमान तो उन्का मन ऐसी रीति सै घटाते बढ़ाते रहते हैं कि न उन्का मन बिगडनें पावै न हद्दसै आगे बढ़नें पावै कोई अनुभवी मध्यम प्रकृति के मनुष्यों को बीचमैं रखते हैं कि वह उन्को वाजबी राह बताते रहैं. परन्तु लाला मदनमोहन के यहां ऐसा कुछ प्रबन्ध न था दूसरे उस्के बिचार मूजिब मदनमोहन नें अपनें झूंटे अभिमान सै भलाई के बदले जान बूझ कर उस्की इज्जत ली थी इस्कारण हरकिशोर इस्समय क्रोध के आवेश मैं लाल होरहा था और बदला लेनेंके लिये उस्के मनमैं तरंगैं उठती थीं. उस्नें मदनमोहन के मकान सै निकलते ही अपनें जी का गुबार निकालना आरम्भ किया.

पहलै उस्को निहालचन्द मोदी मिला उस्नें पूछा "आज कितने की बिक्री की?"

"ख़रीदारी की तो यहां कुछ हद ही नहीं है परन्तु माल बेच कर दाम किससै लें जिस्को बहुत नफ़े का लालच हो वह भले ही बेचै मुझको तो अपनी रक़म डबोनी मंज़ूर नहीं" हरकिशोरनें जवाब दिया. "हैं! यह क्या कहते हो? लाला साहब की रक़म मैं कुछ धोका है?"

"धोके का हाल थोड़े दिन मैं खुल जायगा मेरे जान तो होना था वह हो चुका."

"तुम यह बात क्या समझ कर कहते हो?" मोदीनें घबरा