पृष्ठ:परीक्षा गुरु.djvu/२३०

विकिस्रोत से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
परीक्षागुरु.
२२०
 


निदान लाला मदनमोहन ब्रजकिशोर के नाम मुख्‌तयार नामा लिखकर अपनें मकान को रवानें हुए.


 

प्रकरण ३०.


नैराश्य (नाउम्मेदी).

फलहीन महील्ह कों खगवृन्द तजैं बन कों मृग भस्म भए।
मकरन्द पिए अरविन्द मिलिन्द तजैं सर सारस सूख गए॥
धन हीन मनुष्य तजैं गणिका नृपकों सठ सेवक राज हए।
बिन स्वारथ कौन सखा जग मैं? सब कारज के हित हीत भए॥÷[१]

भर्तृहरि.

सन्ध्या समय लाला मदनमोहन भोजन करनें गए तब मुंशी चुन्नीलाल और मास्टर शिंभूदयाल को खुलकर बात करनें का अवकाश मिला. वह दोनों धीरे, धीरे बतलाने लगे.

"मेरे निकट तुमनें ब्रजकिशोरसै मेल करनें में कुछ बुद्धिमानी नहीं की. बैरी के हाथ मैं अधिकार देकर कोई अपनी रक्षा कर सक्ता है?" मास्टर शिंभूदयाल नें कहा.

"क्या करूं? इस्समय इस युक्ति के सिवाय अपनें बचाव का कोई रस्ता न था. लोगों की नालिशें हो चुकीं, अपनें भेद


  1. ÷ वृक्षं क्षीणफलं त्यजन्ति विहगा दग्धं वनांन्तं मृगाः।
    पुष्पं पीतरसं त्यजन्ति मधुपा शुष्कं सरः सारसाः॥
    निर्द्रव्यं पुरुष त्यजन्ति गणिका भ्रष्ट नृपं मन्त्रिणः।
    सर्वः कार्यवशज्जनो भिरमते कः कस्यने बल्लभः॥