पृष्ठ:परीक्षा गुरु.djvu/९७

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बिगाड़ का मूल-विवाद
 

“मुझको इतना ही कहना है कि मैंने अब तक अपनी समझ मुजिब आप को अप्रसन्न करने की कोई बात नहीं की परंतु मेरी सब बातें आपको बुरी लगती हैं तो में भी ज्यादा आवा जाई रखने में प्रसन्न नहीं हूंँ. किसी ने सच कहा है "जब तो हम गुल थे मियां लगते हजारों के गले॥ अब तो हम खार हुए सब के किनारे ही भले॥" संसार में प्रीति स्वार्थपरता का दूसरा नाम है. "समय निकले पीछे दूसरे से मेल रखने की किसी को क्या ग़रज़ पड़ी है? अच्छा! मेहरबानी कर के मेरे माल की कीमत मुझ को दिलवा दें.” हरकिशोर ने रुखाई से कहा.

“क्या तुम कीमत का तकाजा कर के लाला साहब को दबाया चाहते हो?” मुन्शी चुन्नीलाल बोले.

"हरगिज नहीं मेरी क्या मजाल?" हरकिशोर कहने लगे-“सब जानते हैं कि मेरे पास गांठ की पूंजी नहीं है, मैं जहां-तहां माल लाकर लाला साहब के हुक्म की तामील कर देता था। परंतु अब की बार रुपये मिलने में देर हुई कई एक़रार झूठे हो गए इसलिये लोगों का विश्वास जाता रहा अब आज कल में उनके माल की कीमत उनके पास न पहुंचेगी तो वे मेरे ऊपर नालिश कर देंगे और मेरी इज़्ज़त धूल में मिल जायगी।"

“तुम कुछ दिन धैर्य धरो तुम्हारे रुपये का भुगतान हम बहुत जल्दी कर देंगे" लाला मदनमोहन ने कहा.

“जब मेरे ऊपर नालिश हो गई और मेरी साख जाती रही तो फिर रुपये मिलने से मेरा क्या काम निकला? "देखो अवसर को भलो जासों सुधरे काम। खेती सूखे बरसवों घन को निपट निकाम.” मैं जानता हूं कि आप को अपने कारण किसी गरीब