पृष्ठ:प्रताप पीयूष.djvu/११५

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(१०३)

में रिया (फा़रसी में कपट को रिया कहते हैं) का बास हो।
लोगाई-जिसमें नौ गौओं की सी पशुता हो। बंगाली लोग

बहुधा नकार के बदले लकार और लकार के बदले नकार

बोलते हैं, जैसे नुकसान को लोक़्शान,निर्लज्ज को निरनज्ज।


जोरू-जो रूठना खूब जानती हो।


पुरुख-पुरु कहत हैं जेह में खेतु सींचा जाथै, और 'ख'

आकाश (संस्कृत में।) अर्थात् शून्य । भावार्थ यह हुआ

कि एक पानी भरी खाल, जिसके भीतर अर्थात् हृदय में

कुछ न हो । 'मूर्खस्य हृदयं शून्य' लिखा भी है।


मनसवा-मन अर्थात् दिल और शव अर्थात् मुरदा (आका-

रान्त होने से स्त्रीलिंग हो गया) भाव यह कि स्त्री के

समान अकर्मण्य, मुर्दा दिल, बेहिम्मत।


मर्द-मरदन किया हुआ, जैसे लतमर्द ।


खसम-अरबी में खिस्म शत्रु को कहते हैं ।


सन्तान-जो सन्त अर्थात् बाबा लम्पटदास की आन से जन्मे।


बालक-बा सरयूपारी भाषा में है' को कहते हैं। जैसे ऐसन

बा अर्थात् ऐसा ही है, और लक निरर्थक शब्द है। भाव

यह कि होना न होना बराबर है।


लड़का-जो पिता से तो सदा कहे लड़, अर्थात् लड़ ले और

स्त्री से कहे, का ( क्या आज्ञा है ?)


छोरा-कुलधर्म छोड़ देने वाला (रकार ड़कार का बदला)