पृष्ठ:प्रताप पीयूष.djvu/१५९

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ जाँच लिया गया।


(१४७)


मन्दिर में प्रेम का प्रकाश है तौ संसार शिवमय है क्योंकि प्रेम ही वास्तविक शिवमूर्ति अर्थात् कल्याण का रूप है।


सोने का डण्डा और पौंड़ा ।

देखने में सुवर्ण दंड ही सुन्दर है। ताप देखो सुलाख देखो तो स्वर्ण दंड ही अपनी खराई दिखलावैगा । उसका बनना और ताकना बड़ी कारीगरी, बड़े खर्च, बड़ी शोभा और बड़ी चिन्ता का काम है। पर हम पूछते हैं कि जो पुरुष भूखा है, जो भूख के मारे चाहता है कुछ ही मिल जाय, तो आत्मा शान्ति हो उसके लिये वह डंडा किस काम है ? कदाचित बालक भी कह देगा कि कौड़ी काम का नहीं। यदि उसको बेचने जाय तो खरीदार मिलना मुशकिल है। साधारण लोग कहेंगे कहां का एक दरिद्र 'एक दम आगया जो घर की चोजैं बेचे डालता है। कोई कहेगा कहां से उड़ा लाए ? सच तो यह है, जो कोई ऐसा ही शौकीन आँख का अन्धा गांठ का पूरा मिलेगा तो ले लेगा । परन्तु भूखी आत्मा इतनी कल है कि स्वर्ण दंड से परंपरा द्वारा भी अपना जी समझा सके। कदापि नहीं। इधर पौंडे को देखिये देखने में सुन्दरता व असुन्दरता का नाम नहीं, परीक्षा का काम नहीं। लड़का भी जानता है कि मिठाइयों भर का बाप है। बनाने और बनावाने वाला संसार से परे है। ले के चलने में कोई शोभा है न अशोभा । ताकने में कोई बड़ा खट खट तो नहीं है।