पृष्ठ:प्रताप पीयूष.djvu/१६४

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ जाँच लिया गया।


( १५२ )


बन जाता है। आप चाहे जैसे बलवान, धनवान, विद्वान हों;पर यदि पंच की मरजी के खिलाफ़ चलिएगा तो अपने मन में चाहे जैसे बने बैठे रहिए, पर संसार से आपका वा आपसे संसार का कोई काम निकलना असम्भव नहीं तो दुष्कर अवश्य हो जायगा। हां, सब झगड़े छोड़कर विरक्त हो जाइए तो और बात है । पर, उस दशा में भी पंचभूतमय देह एवं पंचज्ञानेन्द्रिय, पंचकर्मेन्द्रिय का झंझट लगा ही रहेगा। इसी से कहते हैं कि पंच का पीछा पकड़े बिना किसी का निर्बाह नहीं। क्योंकि पंच जो कुछ करते हैं, उसमें परमेश्वर का संसर्ग अवश्य रहता है, और परमेश्वर जो कुछ करता है वह पंच ही के द्वारा सिद्ध होता है। बरंच यह कहना भी अनुचित नहीं है कि पंच न होते तो परमेश्वर का कोई नाम भी न जानता। पृथ्वी पर के नदी, पर्वत, वृक्ष, पशु, पक्षी और आकाश के सूर्य, चंद्र, ग्रह, उपग्रह नक्षत्रादि से परमेश्वर की महिमा विदित होती सही, पर किसको विदित होती ? अकेले परमेश्वर ही अपनी महिमा लिए बैठे रहते।

सच पूछो तो परमेश्वर को भी पंच से बड़ा सहारा मिलता है । जब चाहा कि अमुक देश को पृथ्वी भर का मुकुट बनावैं, बस आज एक, कल दो, परसो सौ के जी में सद्गुणों का प्रचार करके पंच लोगों को श्रमी, साहसी, नीतिमान् , प्रीतिमान बना दिया । कंचन बरसने लगा। जहां जी में आया कि अमुक जाति अब अपने बल, बुद्धि, वैभव के घमंड के मारे बहुत