पृष्ठ:प्रताप पीयूष.djvu/१७९

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समझकर ऐसा कर उठाते हों। इससे हमारी समझ में तो और कोई स्वतंत्रता न होने पर केवल इसी रीति की स्वतंत्रता को दिमाग का खलल समझना चाहिए । फिर भला जिनके विषय में हम इतना बक गए वह बुद्धि-विभ्रम के रोगी हैं वा स्वतंत्र हैं ?

परतंत्रता के जो २ स्थान ऊपर गिना आए हैं उस ढंग के स्थलों पर स्वतंत्रता दिखावैं तो शीघ्र ही धृष्टता का फल मिल जाता है । इससे स्वतंत्र नहीं बनते। यदि परमेश्वर हमारा कहा मानें तो हम अनुरोध करें कि देव, पितृ, धर्म-ग्रन्थादि की निन्दा जिस समय कोई करे उसी समय उसके मुंह में और नहीं तो एक ऐसी फुड़िया ही उपजा दिया कीजिए, जिसकी पीड़ा से दो चार दिन नींद-भूख के लाले पड़े रहें, अथवा पंचों में हमारा चलता हो तो उन्हीं से निवेदन करें कि निंदकमात्र के लिए जातीय कठिन दंड ठहरा दीजिए फिर देखें बाबू साहब कैसे स्वतंत्र हैं !