पृष्ठ:प्रताप पीयूष.djvu/१९६

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गज़ल
विवादी बढ़े हैं यहाँ कैसे कैसे।
'कलाम आते हैं दरमियां कैसे कैसे'॥
जहां देखिये म्लेछ सेना के हाथों।
'मिटे नामियों के निशां कैसे कैसे'॥
बने पढ़ के गौरंड भाषा द्विजाती।
'मुरीदाने पीरो-मुगां कैसे कैसे॥
बसो मूर्खते देवि आय्र्यों के जी में।
'तुम्हारे लिये हैं मकाँ कैसे कैसे'॥
अनुद्योग आलस्य सन्तोष सेवा ।
'हमारे भी हैं मिहरबाँ कैसे कैसे'॥
न आई दया गो-भक्षियों को।
'तड़पते रहे नीमज़ां कैसे कैसे'॥
विधाता ने याँ मक्खियाँ मारने को।
'बनाये हैं खुसरू जवां कैसे कैसे'॥
अभी देखिये क्या दशा देश की हो।
'बदलता है रंग आसमाँ कैसे कैसे॥
हैं निर्गन्ध इस भारती बाटिका के।
'गुलो लाल वो अरगवां कैसे कैसे'॥