पृष्ठ:प्रताप पीयूष.djvu/१९७

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( १८६ )

हमैं वह दुखद हाल भूला है जिसने।
'तवाना किये नातवाँ कैसे कैसे'॥
प्रताप अपनी होटल में निर्लज्जता के।
'मजे लूटती है ज़बां कैसे कैसे'॥
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गज़ल
वह बदखू राह क्या जाने वफा की,
'अगर गफ़लत से बाज़ आया जफ़ा की'॥
न मारी गाय गोचारन किया बन्द,
'तलाफ़ी की जो ज़ालिम ने तो क्या की'।
मियाँ आये हैं बेगारी पकड़ने,
'कहे देती है शोखी नक्शेपा की'॥
पुलिस ने और बदकारों को शह दी,
'मरज़ बढ़ता गया ज्यों ज्यों दवा की'।
जो काफ़िर कर गया मन्दिर में विद्दत,
'वह जाता है दुहाई है खुदा की'॥
शबे क़त्ल आगरे के हिन्दुओं पर,
'हक़ीक़त खुल गई रोजे जज़ा की'॥
खबर हाकिम को दें इस फ़िक्र में हाय,
'घटा की रात और हसरत बढ़ा की'।
कहा अब हम मरे साहब कलक्टर,