पृष्ठ:प्रताप पीयूष.djvu/१९९

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कलिया और शराब बिना नहिं कौर उठावत।
केश भेष महं निपट नजाकत नितहि दिखावत॥
केवल पूजा तजि न और आरजपन राखत।
कौन दूसरी आस जु निज भाषहु नहिं भाषत॥
कसबिन संग काटत बयस वर एक न छत्रिय आचरन।
कायस्थ बंश कलि प्रिय जयतु भारत कहं गारत करन॥३॥
कुलवंतन कहं देत कुकृति कर सविध सुभीता।
कम दामन मद, मास, मीन, मैथुन चित चीता॥
काहू सो न कुपथिन कर कछु भेद बखानत।
कौल धर्म के सकल सबिध संकेतहि जानत॥
कलवरिया तीरथ थापि बरबनि दीक्षित तारन तरन।
कलि भंडारी, कलवार जय भारत कहं गारत करन॥४॥
कलह कुबच कुलवान सिसुन कहं सहज सिखावत।
कांधे डोली धरि पापिन इत उत पहुंचावत॥
कोटिन कीटन मछरिन कहं हंसि २ संहारत।
कबहुं चोर संग मिलत साह कर भवन उजारत॥
कंठी बांधे भगतहु बने घात न चूकत घुसि घरन
कलि दूत कहारहु धन्य हैं भारत के गारत करन॥५॥
करत रहत पशु घात दया की छुवत न छाहीं।
केवल नामहि हिन्दू यवन सांचहु कछु नाहीं॥
काहू कर नहिं शील करत ऐंठत सबही सन।
करि निज पाप प्रसंस दुखावत रहत सुजन मन॥