पृष्ठ:प्रताप पीयूष.djvu/१९८

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'कहा मैं क्या करूँ मरजी खुदा की'।
ज़मीं पर किसके हो हिन्दू रहें अब,
'खबर लादे कोई तहतुस्सरा की'।
कोई पूछे तो हिन्दुस्तानियों से,
'कि तुमने किस तवक्का पर वफ़ा की'।
उसे मोमिन न समझो ऐ बरहमन,
'सताये जो कोई खिलकत खुदा की'।
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ककाराष्टक।
कलह करावन माहिं परम पंडित कलुषाकर।
कोटिन कल्पित पंथ प्रचारि सधर्म नीति हर॥
काम कला सिसु ताहि मोहिं सिखवत बल नासत।
कहुं मंहगी कहुं कुरुज भांति भांतिन परकाशत॥
करके मिस दीन प्रजान कर सब प्रकार सरबस हरन।
कलिराज कपटमय जयति जय भारत कहं गारत करन॥१॥
करुणानिधि पद बिमुख देव देवी बहु मानत।
कन्या अरु कामिन सराप लहि पाप न जानत॥
केवल दायज लेत और उद्योग न भावत।
करि बकरा भच्छन निज पेटहि कबर बनावत॥
का खा गा घा हू बिन पढ़े तिरबेदी पदवी धरन।
कलह प्रिय जयति कनौजिया भारत कहं गारत करन॥२॥