पृष्ठ:प्रताप पीयूष.djvu/२०१

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गौराङ्गदेव उवाच
नित हमरी लातैं सहैं हिन्दू सब धन खोय।
खुलै न “इङ्गलिश पालिसी" जन्म सुफल तब होय॥२॥
पादरी साहब उवाच।
हम जो चाहें सो करें पै दुलखै मति कोय। :
जग हमार चेला बने जन्म सुफल तब होय॥३॥
भेड़ राज उवाच।
हिन्दु मिलें बरु धूर में, बरु थूकहिं मोहि लोय।
पै अपनावहिं श्वेत प्रभु जन्म सुफल तब होय॥४॥
गौरण्डदास उवाच।
जग जाने इङ्गलिश हमैं बाणी बस्त्रहि जोय।
मिटै बदन कर श्याम रंग जन्म सुफल तब होय॥५॥
हज़रत उवाच।
घर न सनहकी हू रहैं कह नवाब सब कोय।
हिन्दू नित हम पर कुढ़ैं जन्म सुफल तब होय॥६॥
सेठ उवाच।
बुधि विद्या बल मनुजता छुवहि न हम कहँ कोय।
लछमिनियां घर में बसै जन्म सुफल तब होय॥७॥
अमीर उवाच।
हवा न लागे देह पर करें खुशामद लोय।
कोउ न खरी हमसे कहै जन्म सुफल तब होय॥८॥