पृष्ठ:प्रताप पीयूष.djvu/२०९

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( १९८)

उर्दू अनुवाद
(यह कोई गीत नहीं है कि सब अंतरों में एक सा भाव
होता। यह तो प्रेमियों के विनोदार्थ थोड़ी सी बातें फुटकर
पद्य बद्ध कर दी गई हैं।
इसका उर्दू में भावार्थ
जहां कायल है जिस शाहंशाहे खूंवा की वहिदत का॥
हमारे दिल को भी दावा है कुछ उसकी मुहब्बत का॥१॥
न कैदी हूं किसी मजहब का न मैं पाबन्द मिल्लत का॥
किसी अपने का कोई एक हूं बन्दा मुहब्बत का॥२॥
अगर्चे ख्वाब में भी तुझको आखों ने नहीं देखा॥
वले ऐ जानेजां! बोयम है तू ही दिल की वहिशत का॥३॥
ना क़ाफ़िर हूं कि मुझको खौफ़ हो नारे जहन्नुम से॥
न हूं दीदार जो हो मुझको लालच बारो जन्नत का॥४॥
हमारी जान ले लेना तलक है प्यार से उसको॥
कहां का शिकवए रंज और कैसा शुक्र राहत का॥५॥
नहीं झुकने के पेशे गैर हम भी सूरते शैतां॥
पिन्हाए शौक से अहले मज़हब तीक लानत का॥६॥
खुदा को किसने देखा? कब कहां बुत ने अनल मअबूद(मैं ईश्वर हूं)।
परस्तार इश्क़ के सब हैं तअस्सुब है हिमाक़त का॥७॥
कुएं में हों फ़रिश्ते कैद गुज़रैं अर्श से इन्सा॥
समझता कौन है हिकमत खुदा की भेद उल्फत का॥८॥
बरहमन दिल में आती है अजब इकतई की मस्ती॥