पृष्ठ:प्रताप पीयूष.djvu/२२०

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(२०९)

अहौ विष्णु भगवान, बताओ केहि गुन कहिए तृप्यन्ताम ।।
(३)
रहे रुवाय देत रिपु कुल कहं जब हम कठिन ठानि संग्राम ।
तब तरपन हूं सोहत हो अरु भारत वीर विदित हो नाम ।।
अब तो छुरी छुवत डर लागै राज नियम बस बनिगये बाम (स्त्री)।
केहि विधि कहैं निलज है हा हा रुद्र देवता तृप्यन्ताम ।।
(४)
खोय धर्म, धन, बल, बुद्धि, विद्या, नेम, प्रेम आदिक गुण ग्राम ।
पाप पखंड अविद्या आलम औगुन के बनि रहे गुलाम ॥
यह गति देखहु निज बंशिन की सब बिधि बोरि रहे तब नाम ।
हृदय होय तौ होहु सबै ऋषि आंसुन के जल तृप्यन्ताम ।।
(५)
गये विदेश भागि भारत ते राग रागिनी सुर लय ग्राम ।
गिने जात अब इहाँ सबै गुन कलावंत कथिकन के काम ॥
लोग मृगहु से तुच्छ बसैं बहु नाद ब्रह्म सों विमुख निकाम ।
होहु जाय सरस्वति बीणा सुनि हे गन्ध्रव गन तृप्यन्ताम ।।
(६)
तब विद्या गुन कला कुशलता लन्दन माहिं करें विश्राम ।
जिन सों हमरै पितर लहत हे लोक लाभ पर लोक अराम ॥
हम तौ यहौ न जानैं तुम्हरो कैसो चरित कहा है नाम ।
क्यों बिन काज कहैं भूठे बनि आचारज कुल तृप्यन्ताम ।।