पृष्ठ:प्रताप पीयूष.djvu/२२१

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(२१०)

(७)
लक्ष्मी तुम्हरे पार गई किमि कीजै पूजा को इतमाम ।
अब यह देश डुबोय देहु बसि हम वर मांगें करि परनाम ।।
निधन (मृत्यु)उचित है निरधन को न तु कौन आसव्याकुल नर वाम ।
अंजलि जल दै कै हे सागर तुम सों कहि हैं तृप्यन्ताम ।।
(८)
उदय उछाह मरीचि करैं नहिं उर पुर तम मय रहत मुदाम ।
मरी चिरैया सरिस परै हम धरे चोंच पद पच्छ निकाम ।।
हमरी चित्त वृत्ति कहं ऐसी होहिं जु तब रुचिकर परिणाम ।
है हौ कहा हमारो हाथन हे मरीचि मुनि तृप्यन्ताम ।।
(९)
इन हाथन सों देहिं कहा जल जे सेवहिं पर चरन मुदाम ।
रहत विश्व पदनान दलित नित तेहि शिर सों किमि करैं प्रणाम ।।
जौन जीह निशि दिन सूखति है बकत खुशामद कपट कलाम ।
यासो कैसे कहैं हहा हम अहो पितामह तृप्यन्ताम ।।
(१०)
रावन रहे तिहारो नाती शिव पद रत धन बल बुधि धाम ।
उनके गुन एकौ नहिं हममें हां औगुन हैं भरे तमाम ।।
द्विज कहाय लाजहि बिहाय नित करहिं राकसन के से काम ।
जो यहि नाते रोझि सको तो पुलस्ति बाबा तृप्यन्ताम ॥
(११)
पढ़ैं पढ़ावै सोई भाषा जामें चले पेट को काम ।