पृष्ठ:प्रताप पीयूष.djvu/२८

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( २० )

गऊ रच्छिनी कठिन काम है, नाहीं खेल लरिकवन क्यार ।

दिन भर बारन के ऐंछैया, नहिं करतूत दिखावनहार ॥"
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और भी देखिए कानपुर वालों पर कैसे छींटे डाले हैं:-
"कोऊ काहू हीन कतहुँ सतकर्म सहायक।
केवल बात बनाय बनत प्रहसन सब लायक ।।
कुटिलन सों ठगि जाहिं ठगहिं सूधे सुहृदन कहँ ।
करहिं कुकर्म करोरि छपावहिं न्याय धर्म महँ ।।
कछु डरत नाहिं जगदीश कहँ करत कपट-मय आचरन ।

कलिजुग-रजधानी कानपुर भारत कहँ गारत करन ।।

('ककाराष्टक' से)

गोरक्षा के प्रति उनकी कितनी हार्दिक प्रेरणा थी इसका अनुमान उनकी अमर लावनी 'बाँ बाँ करि तृण दाबि दाँत सों, दुखित पुकारत गाई हैं' से प्रकट होता है। कहते हैं जिस समय एक बार कन्नौज में उन्होंने भरी सभा में यह लावनी सस्वर गाई थी तो कई एक कसाइयों तक के दिल पिघल गये थे। 'कानपुर-माहात्म्य' नाम के आल्हा में भी 'गैया माता तुमका सुमिरौं कीरति सब ते बड़ी तुम्हारि' ये पंक्तियाँ बड़ी भाव-पूर्ण हैं।

देशप्रेम तथा स्वतंत्रता के भाव भी उनमें बड़े प्रबल थे। उन्हीं के समय में कांग्रेस का जन्म हुआ था। ऊपर कह चुके हैं कि उसके जन्मदाता ह्यूम साहब में उनकी कितनी श्रद्धा थी।