पृष्ठ:प्रताप पीयूष.djvu/३३

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गुण किंवा उनके चरित्र की स्मरणीय विशेषतायें सभी भारतें के संपर्क से प्रस्फुटित हुई थीं। उनके साहित्यिक महत्त्व का विश्लेषण विना भारतेंदु का उल्लेख किये अधूरा रहता है।

एक बार भारतेंदु सख्त बीमार पड़ गये थे। जब वे आराम हुए तब 'प्रतापहरी' ने उन पर एक बड़ा सरस क़सीदा लिखा था। उसका कुछ अंश दिया जाता है जिससे बाचकों को पता लग सकेगा कि मिश्र जी भारतेंदु को कितनी. भक्ति से देखते थे:-

"बनारस की ज़मों नाजां है जिसकी पायबोसी पर ।

अदब से जिसके आगे चर्ख ने गरदन झुकाई है ।
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कहे गर इन दिनों वायज़ कि मय पीना नहीं अच्छा ।
तो बेशक मस्त कह बैठें कि तुमने भाँग खाई है ॥
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उसे क्या कोई दिखलावेगा अपने खाम के जौहर ।

रसा है वह खुद उसके जिहन की वाँ तक रसाई है ॥"

भारतेंदु के प्रेमपात्र तथा भक्त होने का प्रतापनारायण को गर्व भी था। वैसे भी बैसवाड़े के रहनेवाले कान्यकुब्जों की ठसक उनमें थी ही। उसके अतिरिक्त उनकी प्रकृति में उदंडता और अहम्मन्यता काफ़ी थीं। ये दोनों बातें उच्च कोटि के साहित्यसेवियों तथा कलाविदों में अक्सर मिलती हैं।

एक बार प्रतापनारायण के किसी भक्त ने बड़े स्नेहमय