पृष्ठ:प्रताप पीयूष.djvu/६३

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काम शरीर का राजा है, यह सभी मानते हैं, और क्रोधादि पांचो उसके भाई वा सेनापति हैं। यदि यह न होने के बराबर हों तो मानो हृदय, नगर, अथवा जीवन, देश ही कुछ न रहा। किसी राजवर्ग के सर्वथा वशीभूत होके रहना गुलाम का काम है वैसे ही राज-पारिषद का नाश कर देने की चेष्टा करना भी मूर्ख, अदूरदर्शी अथवा आततायी का काम है। सच्चा-बुद्धिमान, वास्तविक वीर वा पुरुषरत्न हम उसको कहेंगे जो इन छहों को पूरे बल में रखके इनसे अपने अनुकूल काम ले। यदि किसी ने बलनाशक औषधि आदि के सेवन से पुरुषार्थ का और "ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्या" का दृढ़ विश्वास कर के कामनाओं का नाश कर दिया, और यावत् सांसारिक सम्बन्ध छोड़ के सब से अलग हो रहा तो कदाचित् षड्वर्ग का उसमें अभाव हो जाय; -यद्यपि संभव नहीं है-पर उसका जीवन मनुष्य-जीवन नहीं है।

धन्य जन वे हैं जो काम-शक्ति को अपनी स्त्री के पूर्ण सुख देने और बलिष्ठ संतान के उत्पन्न करने के लिए रक्षण और वर्धन करने में लगावें, कामना अर्थात् प्रगाढ़ इच्छा प्रेममय परमात्मा के भजन और देश-हित की रक्खें, क्रोध का पूर्ण प्राबल्य अपने अथच देश-भाइयों के दुःख अथच दुर्गुण पर लगा दें, (अर्थात् उन्हें कच्चा खा जाने की नियत रक्खें ) लोभ सद्विद्या और सद्गुण का रक्खें, मोह अपने देश, अपनी भाषा और अपनेपन का करें। जान जाय पर इन्हें न जाने दें। अपने आर्यत्व, अपने पूर्वजों के यश का पूर्ण मद (अहंकार) रक्खें।