पृष्ठ:प्रताप पीयूष.djvu/८७

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जिस समय मृत्यु की दाढ़ के बीच बैठे हैं, जल के कछुए; मछली, स्थल के कौआ, कुत्ता आदि दांत पैने कर रहे हैं, उस समय में भी यदि सत चित्त से भगवान का भजन न किया तो क्या किया ? आपकी हड्डियां हाथी के दांत तो हई नहीं कि मरने पर भी किसी के काम आबैंगी। जीते जी संसार में कुछ परमार्थ बना लीजिए, यही बुद्धिमानी है। देखिए, आपके दांत ही यह शिक्षा दे रहे हैं कि जबतक हम अपने स्थान, अपनी जाति (दंतावली) और अपने काम में दृढ़ हैं तभी तक हमारी प्रतिष्ठा है। यहां तक कि बड़े २ कवि हमारी प्रशंसा करते हैं, बड़े २ सुन्दर मुखारबिन्दों पर हमारी मोहर 'छाप' रहती है । पर मुख से बाहर होते ही हम एक अपावन, घृणित, और फेंकने योग्य हड्डी हो जाते हैं-

"मुख में मानिक सम दशन बाहर निकसत हाड़"

हम जानते हैं कि नित्य यह देखके भी आप अपने मुख्य देश भारत और अपने मुख्य सजातीय हिन्दू-मुसलमानों का साथ तन-मन-धन और प्रान-पन से क्यों नहीं देते ? याद रखिए-

'स्थान भ्रष्टा न शोभंते, दंता केशा नखा नराः' ।

हां, यदि आप इसका यह अर्थ समझे कि कभी किसी दशा में हिन्दुस्तान छोड़के विलायत जाना स्थान-भ्रष्टता है तो यह आपकी भूल है। हंसने के समय मुंह से दांतों का निकल पड़ना नहीं कहलाता, बरंच एक प्रकार की शोभा होती है।