पृष्ठ:प्रताप पीयूष.djvu/८६

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करने तथा हंसने में दृष्टि आते हैं उस समय रसिकों के नयन और मन इतने प्रमुदित हो जाते हैं कि जिनका वर्णन गूंगे को मिठाई है ! हास्य रस का तो पूर्ण रूप ही नहीं जमता जब तक हंसते हंसते दांत न निकल पड़ें। करुणा और रौद्र रस में दुःख तथा क्रोध के मारे दांत अपने होंठ चबाने के काम आते हैं, एवं अपनी दीनता दिखाके दूसरे को करुणा उपजाने में दांत दिखाए जाते हैं । रिस में भी दांत पीसे जाते हैं। सब प्रकार के वीर रस में भी सावधानी से शत्रु की सौन्य अथवा दुःखियों के दैन्य अथवा सत्कीर्ति की चाट पर दांत लगा रहता है। भयानक रस के लिए सिंह-व्याघ्रादि के दांतों का ध्यान कर लीजिए, पर रात को नहीं, नहीं तो सोते से चौंक भागोगे। वीभत्स रस का प्रत्यक्ष दर्शन करना हो तो किसी जैनियों के जैनी महाराज के दांत देख लीजिए, जिनकी छोटी सी स्तुति यह है कि मैल के मारे पैसा चपक जाता है। अद्भुत रस में तो सभी आश्चर्य की बात देख सुनके दांत बाय, मुंह फैलाय के हक्का बक्का रह जाते हैं। शान्त रस के उत्पादनार्थ श्रीशंकराचार्य स्वामी का यह पद महामंत्र है-

अंगंगलितं पलितं मुंडं, दशन-विहीनं जातं तुडं।

कर धृत कंपित शोभित दंडं भूदपि मुंचस्याशापिंडं ।
भज गोविदं भज गोविंदं गोविंदं भज मूढमते। सच
है, जब किसी काम के न रहे तब पूछे कौन ?

"दांत खियाने खुर घिसे पीठ बोझ नहिं लेइ ।"