पृष्ठ:प्रताप पीयूष.djvu/८९

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बातों की हमें परवा नहीं है। हमारा दांत जिस ओर लगा है, वह लगा रहेगा, औरों की दंतकटाकट से हमको क्या ?

यदि दांतों के सम्बन्ध का वर्णन किया चाहें तो बड़े बड़े ग्रन्थ रंग डालें, और पूरा न पड़े। आदि देव श्री एकदंत गणेश जी को प्रणाम करके श्री पुष्पदंताचार्य ने महिम्न में जिनकी स्तुति की है, उन शिवजी की महिमा, दंतवक्त्र शिशुपालादि के संहा- रक श्रीकृष्ण की लीला ही गा चलें तो कोटि जन्म पार न पावें ! नाली में गिरी हुई कौड़ी को दांत से उठानेवाले मक्खीचूसों की हिजो किया चाहें तो भी लिखते २ थक जायं। हाथी दांत से क्या २ वस्तु बन सकती है ? कलों के पहियों में कितने दांत होते हैं ? और क्या क्या काम देते हैं ? गणित में कौड़ी २ के एक २ दांत तक का हिसाब कैसे लग जाता है ? वैद्यक और धर्मशास्त्र में दंतधावन की क्या विधि है, क्या फल है, क्या निषेध है, क्या हानि है ? पद्धतिकारों ने दीर्घ दंताकचिन्मूर्खा' आदि क्यों लिखा ? किस २ जानवर के दांत किस २ प्रयोजन से किस २ रूप, गुण से विशिष्ट बनाए गए हैं ? मनुष्यों के दांत उजले, पीले, नीले, छोटे, मोटे, लम्बे, चौड़े, घने, खुड़हे कै रीति के होते हैं ? इत्यादि, अनेक बातें हैं, जिनका विचार करने में बड़ा विस्तार चाहिए । बरंच यह भी कहना ठीक है कि यह बड़ी २ विद्याओं के बड़े २ विषय लोहे के चने हैं, हर किसी के दांतों फूटने के नहीं ! तिसपर भी अकेला आदमी क्या २ लिखे ?

अतः इस दंतकथा को केवल इतने उपदेश पर समाप्त करते