पृष्ठ:प्रताप पीयूष.djvu/९०

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हैं कि आज हमारे देश के दिन गिरे हुए हैं, अतः हमें योग्य है कि जैसे बत्तिस दांतों के बीच जीभ रहती है वैसे रहें, और अपने देश की भलाई के लिए किसी के आगे दांतों में तिनका दबाने तक में लज्जित न हों, तथा यह भी ध्यान रक्खें कि हर दुनियादार की बातें विश्वास-योग्य नहीं है। हाथी के दांत खाने के और होते हैं, दिखाने के और ।


'द'।

हमारी और फारसवालों की वर्णमालाभर में इससे अधिक अप्रिय, कर्णकटु और अस्निग्ध अक्षर, हम तो जानते हैं, और न होगा। हमारे नीति-विदाम्बर अंग्रेज़ बहादुरों ने अपनी वर्ण- माला में, बहुत अच्छा किया, जो इसे नहीं रक्खा। नहीं उस देश के लोग भी देना सीख जाते तो हमारी तरह निष्कंचन हो बैठते । वहां के चतुर लोगों ने बड़ी दूरदर्शिता करके इस अक्षर के ठौर पर 'डकार' अर्थात् 'डी' रक्खी है, जिसका अर्थ ही डकार जाना, अर्थात् यावत् संसार की लक्ष्मी, जैसे बने वैसे, हजम कर लेना। जिस भारत-लक्ष्मी को मुसलमान सातसै वर्ष में अनेक उत्पात करके भी न ले सके उसे उन्होंने सौ वर्ष में धीरे धीरे ऐसे मजे के साथ उड़ा लिया कि हंसते खेलते विलायत जा पहुंची!

इधर हमारे यहां इस 'दकार' का प्रचार देखिए तो नाम के