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प्राचीन चिह्न

नर्मदा के बायें तट पर कई पुराने मन्दिर हैं। यद्यपि उन मन्दिरों की महिमा, इस समय, कम हो गई है, तथापि जो लोग ओङ्कारजी को जाते हैं वे इनके भो दर्शन करते हैं । जिनको पुरानी वस्तुओं से प्रेम है उनको तो इन्हे अवश्य ही देखना चाहिए।

गौरी-सोमनाथ के मन्दिर के सामने एक प्रकाण्ड नन्दी है। हरे पत्थर को काटकर उसकी मूति बनाई गई है।

मान्धाता में नर्मदा के तट पर बने हुए घाटों की शोभा । को देखकर चित्त बहुत प्रसन्न होता है।

सुनने में आता है कि १०२४ ईसवी में जब महमूद गज़- नवी ने सोमनाथ के मन्दिर को तोड़ा तब मान्धाता में ओङ्कार- जी के मन्दिर के सिवा अमरेश्वर नामक महादेव का भी एक मन्दिर था। उसकी भी गिनती द्वादश लिङ्गों में थी। परन्तु सत्रहवी और अठारहवी शताब्दी की लड़ाइयों मे नर्मदा का दक्षिणी तट, जहाँ पर ये दोनों मन्दिर थे, बिलकुल उजाड़ हो गया। उस पर इतना घना जङ्गल हो आया कि जब पेशवा ने ओड्रारजी के मन्दिर की मरम्मत करानी चाही तब वह, बहुत हूँढ़ने पर भी, न मिला। इससे उसने एक नया ही मन्दिर बनवाकर उसका नाम ओङ्कारजी रख दिया। पीछे से राजा मान्धाता को ओड्करजी का पुराना मन्दिर मिला और उसने उसकी मरम्मत भी कराई। परन्तु पेशवा के बनवाये हुए मन्दिर का तब तक इतना नाम हो गया था, कि लोगों ने