सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:प्रेमघन सर्वस्व भाग 1.djvu/४३८

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
—४११—

⁠जनु कछु...अनुमानत॥टेक॥
श्री बदरी नारायन कबिवर
⁠कनक कुम्भ सम पीन पयोधर
जनु राखी चतुरानन विष भर,
⁠दरसत ही लेते सुध बुध हर,
होते अन्त प्रान गाहक
⁠नहिं नेक दया उर आनत ॥१६॥

⁠चितवन वारी छवि न्यारी, (तव)
⁠तिरछे दृग की प्यारी॥टेक॥
श्री बदरी नारायन प्यारे, मत वारे भारे रतनारे,
छीन मीन करि देत निहारे, कंज खंज अलि कीनों कारे,
काटन हेत करेजन प्रेमिन—मनहुँ मनोज कटारी॥१७॥

⁠रोकत श्याम जाँव कित पानी॥टेक॥
जान न देत छैल जसुदा को,
⁠रोकत बाट सदा हठ ठानी।
गाली देत बीच मुरली के,
⁠वनमाली आली अभिमानी॥
बद्रीनाथ विलोकत वाके,
⁠छूटत लोक जात कुल कानी॥१८॥

⁠बँसुरिया रे टेरत है बलवीर॥टेक॥
बंसी तान सुनाय कान तिन,
⁠जियको करत अधीर।
चंचल चखनि बिलोकनि बाँकी,
⁠मनहुँ मयन की तीर॥