पृष्ठ:प्रेमचंद रचनावली ५.pdf/१७०

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170 : प्रेमचंद रचनावली-5
 


जरा और अंधेरा हुआ, तो जालपा ने देवीदीन को साथ लिया और रमानाथ का बंगला देखने चली। एक पत्र लिखकर जेब में रख लिया था। बार-बार देवीदीन से पूछती, अब कितनी दूर है? अच्छा । अभी इतनी ही दूर और । वहां हाते में रोशनी तो होगी ही उसके दिल में लहरे-सी उठने लगीं। रमा अकेले टहलते हुए मिल जाएं, तो क्या पूछना। रूमाल में बांधकर खत को उनके सामने फेंक दें। उनकी सूरत बदल गई होगी।

सहसा उसे शंका हो गई-कहीं वह पत्र पढ़कर भी अपना बयान न बदलें, तब क्या होगा? कौन जाने अब मेरी याद भी उन्हें है या नहीं। कहीं मुझे देखकर वह मुंह फेर लें तो? इस शंका से वह सहम उठी। देवीदीन से बोली-क्यों दादा, वह कभी घर की चर्चा करते थे?

देवीदीन ने सिर हिलाकर कहा--कभी नहीं। मुझसे तो कभी नहीं की। उदास बहुत रहते थे।

इन शब्दों ने जालपा की शंका को और भी सजीव कर दिया। शहर की घनी बस्ती से ये लोग दूर निकल आए थे। चारों ओर सन्नाटा था। दिन भर वेग से चलने के बाद इस समय पवन भी विश्राम कर रहा था। सड़क के किनारे के वृक्ष और मैदान चन्द्रमा के मंद प्रकाश में हतोत्साह, निर्जीव-से मालूम होते थे। जालपा को ऐसा आभास होने लगा कि उसके प्रयास को कोई फल नहीं है, उसकी यात्रा का कोई लक्ष्य नहीं है, इस अनंत मार्ग में उसकी दशा उस अनाथ को-सी है जो मुट्ठीभर अन्न के लिए द्वार-द्वार फिरता हो। वह जानता है, अगले द्वार पर उसे अन्न न मिलेगा, गालियां ही मिलेंगी, फिर भी वह हाथ फैलाता है, बढ़ती भनाता है। उसे आशा का अवलंब नहीं निराशा ही का अवलंब है। एकाएक सड़क के दोहनी तरफ बिजली का प्रकाश दिखाई दिया। देवीदीन ने एक बंगले की ओर उंगली उठाकर कहा-यही उनका बंगला है। जालपा ने डरते-डरते,उधर देखा, मगर बिल्कुल सन्नाटा छाया हुआ था। कोई आदमी न था। फाटक पर ताला पड़ा हुआ था। जालपा बोली--यहां तो कोई नहीं है। देवीदीन ने फाटक के अंदर झांककर कहा-हां, शायद यह बगला छोड़ दिया। 'कहीं घूमने गए होंगे?' 'घूमने जाते तो द्वार पर पहरा होता। यह बंगला छोड़ दिया। 'तो लौट चलें।' नहीं, जरा पता लगाना चाहिए गए कहां?' बंगले की दहिनी तरफ आमों के बाग में प्रकाश दिखाई दिया। शायद खटिक बाग की रखवाली कर रहा था। देवीदीन ने बाग में आकर पुकारा-कौन है यहां? किसने यह बाग लिया एक आदमी आमों के झुरमुट से निकल आया। देवीदीन ने उसे पहचानकर कहा- अरे । तुम हो जगली? तुमने यह बाग लिया है? जगली ठिगना-सा गठीला आदमी था, बोला–हां दादा, ले लिया, पर कुछ है नहीं। इंड ही भरना पड़ेगा। तुम यहां कैसे आ गए?