पृष्ठ:प्रेमसागर.pdf/१०७

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चंद निकले तब नंद जसोदी ने आनंद कर बहुत सा दान पुन्य किया, पुत्र का मुख देख नैनो को सुख दिया, औ सब ब्रजवासियो के भी जी में जी आया। इसी बीच साँझ हुई तो आपस में कहने लगे कि अब दिन भर के हारे, थके, भूखे, प्यासे, घर कहाँ जायँगे, रात की रात यहीं काटें, भोर हुए बूंदाबन चलेगे। यह कह सब सोये रहे।

आधी रात बीत जब गई। भारी कारी आँधी भई॥
दावा अग्नि चली चहुँ ओर। अति झरबरे वृक्ष बन ढोर॥

आग लगते ही सब चौक पड़े और घबराकर चारो ओर देख देख हाथ पसार लगे पुकारने कि हे कृष्ण, हे कृष्ण, इस आग से बेग बचाओ, नहीं तो यह छन भर में सबको जलाय भस्म करती है। जब नंद जसोदा समेत ब्रजवासियों ने ऐसे पुकार को तब श्रीकृष्णचंदजी ने उठते ही वह आग पल में पी सबके मन की चिंता दूर की। भोर होते ही सब बृंंदावन आए, घर घर आनंद मंगल हुए बधाए।