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पृष्ठ:प्रेमसागर.pdf/११३

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इस आनंद से बरषा ऋतु बीती, तब श्रीकृष्ण बाल बालों से कहने लगे कि भैया, अब तो सुखदाई सरद ऋतु आई ।

सबको सुख भारी अब जान्यो, स्वाद सुगंध रूप पहिचान्यो ।
निसि नक्षत्र उज्जल आकाश, मानहु निर्गुन ब्रह्म प्रकाश ।।
चार मास जो बिरमे गेह, भये सरद तिन तजे सनेह् ।
अपने अपने काजनि धाये, भूप चढे तकि देस पराये ।।