पृष्ठ:प्रेमसागर.pdf/१३९

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कर माना, यदुबंसियो ने अपना कर ठान्ना औ जोगी जती सुनियों ने ईश्वर कर ध्याया, पर अंतमें मुक्ति पदारथ सबही ने पाया। जो एक गोपी प्रभु का ध्यान कर तरी तो क्या अचरज हुआ।


यह सुन राजा परीक्षित ने श्रीशुकदेव मुनि से कहा कि कृपा नाथ, मेरे मन को संदेह गया, अब कृपा कर आगे कथा कहिये। श्रीशुकदेवजी बोले कि महाराज, जिस काल सब गोपियाँ अपनै अपने झुंड लिये, श्रीकृष्णचंद जगत-उजागर रूपसागर, से धायकर यो जाय मिलीं कि जैसे चौमासे की नदियाँ बल कर समुद्र को जाय मिले। उस समैं के बनाव की सोभा बिहारीलाल की कुछ बरनी नहीं जाती, कि सब सिंगार करे, नटवर भेष धरे, ऐसे मनभावने सुंदर सुहावने लगते थे कि ब्रज युवती हरि छबि देखतेही छक रहीं। तब मोहन विनकी क्षेम कुशल पूछ रूखे हो बोले―कहो रात समैं भूत प्रेत की बिरियाँ भयावनी बाट काट, उलटे पुलटे वस्त्र आभूषण पहले, अति घबराई, कुटुम्ब की माया तज इस महाबन में तुम कैसे आईं। ऐसा साहस करना नारी को उचित नहीं। स्त्री को कहा है कि कादर, कुमत, कूढ़, कपटी, कुरूप, कोढ़ी, काना, अन्धा, तुला, लँगड़ा, दुरिद्री, कैसाही पति हो पर इसे उसकी सेवा करनी जोर है, इसमें उसका कल्यान है औ जगत में बड़ाई। कुलवन्ती पतिव्रता का धर्म हैं कि पति को क्षण भर न छोड़े और जो स्त्री अपने पुरुष को छोड़ पर पुरुष के पास जाती है सो जन्म जन्म नके बास पाती है। ऐसे कह फिर बोले कि सुनौ, तुमने आघ सघन बैन, निर्मल चाँदनी, औ जमुना तीर की सोभा देखी, अब घर जाय मन लगाय कंत की सेवा करो, इसमें तुम्हारा सब भाँति भला है। इतना बचन श्रीकृष्ण के