पृष्ठ:प्रेम-पंचमी.djvu/१३२

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प्रेम पंचमी

सत्य॰―अच्छा, हाँ दी हागी, पत्र दूकान में पड़ा होगा। मैं इधर कई दिन से दूकान नहीं गया। घर पर सब कुशल है?

ज्ञान॰―माताजी का देहांत हो गया।

सत्य॰―अरे! क्या बीमार थी?

ज्ञान॰―जी नहीं। मालूम नहीं, क्या खा लिया। इधर उन्हें उन्माद-सा हो गया था। पिताजी ने कुछ कटु वचन कहे थे, शायद इसी पर कुछ खा लिया।

सत्य॰―पिताजो तो कुशल से हैं?

ज्ञान॰―हाँ, अभी मरे नहीं हैं।

सत्य॰―अरे! क्या बहुत बीमार हैं?

ज्ञान॰―माता ने विष खा लिया, तो वह उनका मुँह खोल- कर दवा पिला रहे थे। माताजी ने जोर से उनकी दो उँगलियाँ काट लीं। वही विष उनके शरीर में पहुँच गया। तब से सारा शरीर सूज आया है। अस्पताल में पड़े हुए हैं, किसी को देखते है, तो काटने दौड़ते है। बचने की आशा नहीं है।

सत्य॰―तब तो घर ही चौपट हो गया!

ज्ञान॰―ऐसे घर को अब से बहुत पहले चौपट हो जाना चाहिए था।

XXX
 

तीसरे दिन दोनो भाई प्रातःकाल कलकत्ते से बिदा होकर चल दिए।

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