पृष्ठ:प्रेम-पंचमी.djvu/१८

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प्रेम-पंचमी

होता जाता है, और यही कारण है कि हमारी जातीय संस्थाओं को शीघ्र वृद्धि नहीं होती। जिस काम में हमारा दिल न हो, हम केवल ख्याति और स्वार्थ के लिये उसके कर्णधार बने हुए हों, वह कभी सफल नहीं हो सकता। यह वर्तमान सामाजिक व्यवस्था का अन्याय है, जिसने इस पेशे को इतना उच्च स्थान प्रदान कर दिया है। यह विदेशी सभ्यता का निकृष्टतम स्वरूप है कि देश का बुद्धि-बल स्वयं धनोपार्जन न करके दूसरों की पैदा की हुई दौलत पर चैन करना, शहद की मक्खी न बनकर चीटी बनना, अपने जीवन का लक्ष्य समझता है।

मानकी चिढ़कर बोली―“पहले तो तुम वकीलों की इतनी निंदा न करते थे।”

ईश्वरचंद्र ने उत्तर दिया―“तब अनुभव न था। बाहरी टीम- टाम ने वशीकरण कर दिया था।”

मानकी―क्या जाने तुम्हें पत्रों से क्यों इतना प्रेम है। मैं तो जिसे देखती हूँ, अपनी कठिनाइयों का रोना ही रोते हुए पाती हूँ। कोई अपने ग्राहकों से नए ग्राहक बनाने का अनुरोध करता है, कोई चंदा न वसूल होने की शिकायत करता है। बता दो कि कोई उच्च शिक्षा प्राप्त मनुष्य कभी इस पेशे में आया है। जिसे कुछ नहीं सूझता, जिसके पास न कोई सनद है, न कोई डिग्री, वही पत्र निकाल बैठता है, और भूखों मरने की अपेक्षा रूखी रोटियो पर ही संतोष करता है। लोग विला- यत जाते हैं, कोई पढ़ता है डॉक्टरी, कोई इंजीनियरी, कोई