पृष्ठ:प्रेम-पंचमी.djvu/५२

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प्रेम-पंचमी

पूछने गए। मन मे तर्क किया―यह कितना घोर अन्याय है कि एक अबला ऐसे संकट से हो, और मैं उसकी बात भी न पूछूँँ? पर वहाँ से लौटे, तो बुद्धि और विवेक की रस्सियाँ टूट गई थीं, नौका मोह और वासना के अपार सागर में डुब- कियाँ खा रही थी। आह! यह मनोहर छवि! यह अनु- पम सौदर्य!

एक क्षण में उन्मत्तों की भाँँति बकने लगे―यह प्राण और यह शरीर तेरी भेट करता हूँ। संसार हँसेगा, हँसे। महापाप है, ही। कोई चिंता नहीं। इस स्वर्गीय आनंद से मैं अपने को वंचित नहीं रख सकता? वह मुझसे भाग नहीं सकती। इस हृदय को छाती से निकालकर उसके पैरों पर रख दूँँगा। विमल? मर गया। नहीं मरा, तो अब मरेगा। पाप क्या है? कोई बात नही। कमल कितना कोमल, कितना प्रफुल्ल, कितना ललित है! क्या उसके अधरो―

अकस्मात् वह ठिठक गए, जैसे कोई भूली हुई बात याद आ जाय। मनुष्य में बुद्धि के अंतर्गत एक अज्ञात बुद्धि होती है। जैसे रण-क्षेत्र में हिम्मत हारकर भागनेवाले सैनिको को किसी गुप्त स्थान से आनेवाली कुमक सँभाल लेती है, वैसे ही इस अज्ञात बुद्धि ने सुरेश को सचेत कर दिया। वह सँभल गए। ग्लानि से उनकी आँखें भर आईं। वह कई मिनट तक किसी दंडित क़ैदी की भाँति क्षुब्ध खड़े सोचते रहे। फिर विजय-ध्वनि से कह उठे―कितना सरल है। इस विकार के हाथी को