पृष्ठ:प्रेम-पंचमी.djvu/५३

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ जाँच लिया गया।
आभूषण

सिंह से नहीं, चिउँटी से मारूँगा। शीतला को एक बार ‘बहन’ कह देने से ही यह सब विकार शांत हो जायगा। शीतला! बहन! मैं तेरा भाई हूँ!

उसी क्षण उन्होंने शीतला को पत्र लिखा―बहन, तुमने इतने कष्ट झेले; पर मुझे खबर तक न दी! मैं कोई ग़ैर न था। मुझे इसका दुःख है। खैर, अब ईश्वर ने चाहा, तो तुम्हें कष्ट न होगा।

इस पत्र के साथ उन्होंने नाज और रुपए भेजे।

शीतला ने उत्तर दिया―मैया, क्षमा करो। जब तक जीऊँगी, तुम्हारा यश गाऊँगी। तुमने मेरी डूबती नाव पार लगा दी।

( ५ )

कई महीने बीत गए। संध्या का समय था। शीतला अपनी मैना को चारा चुगा रही थी। उसे सुरेश नेपाल से उसी के वास्ते लाए थे। इतने में सुरेश आकर आँगन में बैठ गए।

शीतला ने पूछा―“कहाँ से आते हो, भैया?”

सुरेश―गया था जरा थाने। कुछ पता नहीं चला। रँगून में पहले कुछ पता मिला था। बाद को मालूम हुआ कि वह कोई और आदमी है। क्या करूँ? इनाम और बढ़ा दूँ?

शीतला―तुम्हारे पास रुपए बढ़े हैं, फूँँको। उनकी इच्छा होगी, तो आप ही आवेंगे।

सुरेश―एक बात पूछूँ, बताओगी? किस बात पर तुमसे रूठे थे?

शीतला―कुछ नहीं, मैंने यही कहा कि मुफे गहने बनवा