पृष्ठ:प्रेम-पंचमी.djvu/६१

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आभूषण

एक पग पीछे हट गई। उसे जान पड़ा, विमलसिंह उसकी ओर अत्यंत तीव्र दृष्टि से देख रहे हैं। बुझे हुए दीपक में उसे भयं- कर ज्योति दिखाई पड़ी। वह मारे भय के वहाँ ठहर न सकी। द्वार से निकल ही रही थी कि सुरेशसिंह से भेंट हो गई। कातर स्वर में बोली―“मुझे यहाँ डर लगता है।” उसने चाहा कि रोती हुई इनके पैरो पर गिर पड़ूँ; पर वह अलग हट गए।

( ७ )

जब किसी पथिक को चलते-चलते ज्ञात होता है कि मैं रास्ता भूल गया हूँ, तो वह सीधे रास्ते पर आने के लिये बड़े वेग से चलता है। झुँझलाता है कि मैं इतना असावधान क्यों हो गया? सुरेश भी अब शांति-मार्ग पर आने के लिये विकल हो गए। मंगला की स्नेहमयी सेवाएँँ याद आने लगी। हृदय में वास्तविक सौदर्योपासना का भाव उदय हुआ। समे कितना प्रेम, कितना त्याग था, कितनी क्षमा थी! उसकी अतुल पति- भक्ति को याद करके कभी-कभी वह तड़प जाते। आह! मैंने घोर अत्याचार किया। ऐसे उज्ज्वल रत्न का आदर न किया। मैं यही जड़वत् पड़ा रहा, और मेरे सामने ही लक्ष्मी घर से निकल गई! मंगला ने चलते-चलते शीतला से जो बातें कही थी, वे उन्हें मालूम थी। पर उन बातों पर विश्वास न होता था। मंगला शांत प्रकृति की थी; वह इतनी उद्दंडता नहीं कर सकती। उसमे क्षमा थी, वह इतना विद्वेष नहीं कर सकती। उनका मन कहता था कि जीती है, और कुशल से है। उसके