पृष्ठ:प्रेम-पंचमी.djvu/६४

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प्रेम-पंचमी

सुरेश आशा और भय की दशा में पड़े करवटें बदल रहे थे कि एकाएक द्वार पर किसी ने धोरे से कहा―“जाती क्यो नहीं, जागते तो है!” किसी ने जवाब दिया―“लाज आती है।”

सुरेश ने आवाज़ पहचानी। प्यासे को पानी मिल गया। एक क्षण में मंगला उनके सम्मुख आई, और सिर झुकाकर खड़ी हो गई। सुरेश का उसके मुख पर एक अनूठी छवि दिखाई दी, जैसे कोई रोगी स्वास्थ्य-लाभ कर चुका हो।

रूप वही था, पर आँखे और थीं।





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