पृष्ठ:प्रेम-पंचमी.djvu/९६

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प्रेम-पंचमी

है। बाज़ारी दल इसलिये जलता कि टामी के मारे घूरों पर की हड्डियाँ भी न बचने पाती थी। वह घड़ी रात रहे उठता, और हलवाइयों की दूकानों के सामने के दाने और पत्तल, कसाईख़ाने के सामने की हड्डियाँँ और छीछड़े चबा डालता। अतएव इतने शत्रुओं के बीच में रहकर टामी का जीवन संकट- मय होता जाता था। महीनों बीत जाते, और पेट भर भोजन न मिलता। दो-तीन बार उसे मन-माने भोजन करने की ऐसी प्रबल उत्कंठा हुई कि उसने संदिग्ध साधनों द्वारा उसे पूर्ण करने को चेष्टा को; पर जब परिणाम आशा के प्रतिकूल हुआ और स्वादिष्ट पदार्थों के बदले अरुचिकर, दुर्ग्राह्य वस्तुएँ भर- पेट खाने को मिली―जिससे पेट के बदले कई दिन तक पीठ में विषम वेदना होती रही―तो उसने विवश होकर फिर सन्मार्ग का आश्रय लिया। पर डंडो से पेट चाहे भर गया हो, वह उत्कंठा शांत न हुई। वह किसी ऐसी जगह जाना चाहता था, जहाँ ख़ूब शिकार मिले; ख़रगोश, हिरन, भेड़ो के बच्चे मैदानो में विचर रहे हो, और उनका कोई मालिक न हो; जहाँ किसी प्रतिद्वंद्वी की गंध तक न हो; आराम करने को सघन वृक्षों की छाया हो, पीने को नदी का पवित्र जल। वहाँ मन-माना शिकार करूँ, खाऊँ, और मीठी नीद साऊँ। वहाँ चारो ओर मेरी धाक बैठ जाय; सब पर ऐसा रोब छा जाय कि मुझको ही अपना राजा समझने लगें, और धीरे-धीरे मेरा ऐसा सिक्का बैठ जाय कि किसी द्वेषी को वहाँ पैर रखने का साहस ही न हा।