पृष्ठ:बंकिम निबंधावली.djvu/६२

विकिस्रोत से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
गीति-काव्य।
 

इस प्रकार सुशिक्षितोंका बंगलाके प्रति अनादरका भाव ही बंगलाकी श्रीवृद्धि नहीं होने देता। सुशिक्षित बंगाली बंगला पढ़ते नहीं, इस कारण सुशिक्षित बंगाली बंगलामें लिखते नहीं हैं और, उधर सुशिक्षित बंगाली लिखते नहीं, इस कारण सुशिक्षित बंगाली बंगला पढ़ते नहीं। इस कारण यह आवश्यक है कि सुशिक्षित बंगाली लोग एक साथ ही बंगला लिखना आर पढ़ना शुरू करें। तभी बंगलाकी और साथ ही बंगालकी श्रीवृद्धि होगी।☆

...................................................
गीति-काव्य।

काव्य किसे कहते हैं, यह समझानेके लिए बहुत लोगोंने चेष्टा की है। किन्तु किसीकी चेष्टा सफल हुई है या नहीं, इसमें सन्देह है। यह स्वीकार करना होगा कि दो व्यक्तियोंने कभी एक प्रकारका अर्थ नहीं किया। किन्तु काव्यके यथार्थ लक्षणके सम्बन्धमें मतभेद रहने पर भी काव्य एक ही पदार्थ है, इसमें सन्देह नहीं। चाहे कोई समझा सके या न समझा सके, वह पदार्थ क्या है, इसका अनुभव हर एक काव्यप्रेमी एक प्रकारसे कर सकता है। काव्यका लक्षण चाहे जो हो, हमारी समझमें बहुतसे ग्रन्थ, जिन्हें साधा- रणतः काव्य नहीं कहते, वे भी काव्य हैं। महाभारत और रामायण इति- हास कहकर प्रसिद्ध होनेपर भी काव्य हैं। श्रीमद्भागवत पुराण कहकर प्रसिद्ध होनेपर भी अंश-विशेषमें काव्य है। स्काटके उपन्यास हमारी समझमें उत्कृष्ट-काव्य हैं। यह कहनेकी जरूरत ही नहीं कि हम नाटकोंको काव्यके अन्तर्गत समझते हैं।

भारतवर्षीय और पाश्चात्य आलंकारिकोंने कान्यके अनेक श्रेणी-विभाग किये हैं। उनमें अनेक विभाग अनर्थक जान पड़ते हैं। उन लोगोंकी

_______________________________________________________________

☆ जो बातें बंकिम बाबूने बंगलाके सम्बन्धमें कही हैं वे ही सब बातें हिन्दीके बारेमें भी कही जा सकती हैं, इसी कारण यह लेख भी शामिल कर लिया गया है।-प्रकाशक ।

४९

बं. नि.—४