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पृष्ठ:बाल-शब्दसागर.pdf/२२

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अकबकाना अकबकाना- क्रि० भ० चकित होना । घबराना । अकबरी - संज्ञा स्त्री० ३. एक प्रकार की मिठाई । २. लकड़ो पर की एक नक्काशी | ३. अकबाल - संज्ञा पुं० दे० " इकबाल ” । अकर - वि० १. न करने योग्य | कठिन । २. बिना हाथ का । बिना कर या महसूल का । अकरकरा - संज्ञा पुं० एक पैधा जिसकी जड़ दवा के काम में आती है। अकरण - संज्ञा पुं० [सं०] [वि० प्रकर- णीय ] १. कर्म का अभाव । २. कर्म कान किए हुए के समान या फल- रहित होना । ३. इंद्रियों से रहित, ईश्वर । परमात्मा । वि० न करने योग्य । कठिन । वि० [सं० कारण] बिना कारण का । करणीय - वि० [सं०] न करने योग्य । अकरा | - वि० १. न मोल लेने योग्य । महँगा । २. खरा । श्रेष्ठ । उत्तम । अकरास - संज्ञा स्त्री० [हिं० अकड़ ] अंगड़ाई | देह टूटना । संज्ञा स्त्री० श्रालस्य । सुस्ती । अकरासू - वि० स्त्री० गर्भवती । करी - संज्ञा स्त्री० हल में लगा लकड़ी का चोंगा जिसमें बीज डालते जाते हैं । कर्त्ता - वि० कर्म का न करनेवाला । कर्म से अलग | अकतुक -संज्ञा पुं० बिना कर्त्ता का जिसका कोई कर्त्ता या रचयिता न हो । कर्म-संज्ञा पुं० १. न करने योग्य कार्य । बुरा काम । २. कर्म का अभाव । श्रकर्मक-संज्ञा पुं० वह क्रिया जिसे किसी कर्म की आवश्यकता न हो । ( व्या० ) अकर्मण्य - वि० कुछ काम न करने- वाला । श्रालसी । अकर्मी संज्ञा पुं० [स्त्री० अकर्मिणी] बुरा कर्म करनेवाला | पापी । अपराधी । अकलंक - वि० निष्कलंक । दोषरहित । + संज्ञा पुं० दोष | अकलंकित - वि० निष्कलंक | निर्दोष | अकल - वि० १. जिसके खंड न हैं। । समूचा । २. परमात्मा का एक वि शेषण । वि० विकल । व्याकुज । बेचैन I संज्ञा स्त्रो० दे० "कूल" । अकवन-संज्ञा पुं० श्राक । मदार | कस - संज्ञा पुं० वैर । द्वेष | अकसना क्रि० स० १. कस रखना । वैर करना । २. बराबरी करना । अकसर - क्रि० वि० प्रायः । बहुधा । क्रि० वि० । वि० ( प्रत्य० ) अकेले । बिना किसी के साथ । नकसीर - संज्ञा स्त्री० [अ०] १. वह रस या भस्म जो धातु को सोना या चांदी बना दे । रसायन । कीमिया । २. वह श्रोषधि जो प्रत्येक रोग को नष्ट करे । वि० अन्यर्थ । श्रस्यंत गुणकारी । अकस्मात् क्रि० वि० १. अचानक । एकबारगी । योग से । सहसा । २. दैव- कह - वि० दे० " अकथ" । अकांड - वि० बिना शाखा का । क्रि० वि० अकस्मात् । सहसा । अकांडतांडव -संज्ञा पुं० व्यर्थ की उछल-कूद | व्यर्थ की बकवाद । विर्त डावाद ।