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अतरदान अतरदान- संज्ञा पुं० इत्र रखने का चांदी का बरतन | तरसों - क्रि० वि० १. परसों के आगे का दिन । २. परसों से पहले का दिन । अतर्कित - वि० आकस्मिक | बे सोचा समझा। जो विचार में न आया हो । अतक्र्य - वि० जिस पर तर्क-वितर्क न हो सके । अतल-संज्ञा पुं० सात पातालों में दूसरा पाताल | तलस- संज्ञा स्त्री० एक प्रकार का रेशमी कपड़ा । अतलस्पर्शी - वि० अथाह | अतसी - संज्ञा स्त्री० अलसी । श्रुति - वि० बहुत । श्रधिक । संज्ञा स्त्री० अधिकता । ज्यादती । अतिकाय - वि० स्थूल । मोटा । श्रुतिकाल - संज्ञा पुं० विलंब | श्रतिक्रम-संज्ञा पुं० नियम या मय्यादा का उल्लंघन । विपरीत व्यवहार | श्रतिक्रमण - संज्ञा पुं० हद के बाहर जाना | बढ़ जाना । अतिक्रांत - वि० [सं०] हद्द के बाहर गया हुआ । व्यतीत । अतिथि - संज्ञा पुं०.१ घर में आया हु अज्ञातपूर्व व्यक्ति | अभ्यागत | मेहमान | पाहुन । २. अग्नि । अतिथियज्ञ-संज्ञा पुं० श्रतिथि का आदर-सत्कार । श्रतिथिपूजा । अतिपातक-संज्ञा पुं० पुरुष के लिये माता, बेटी और पतोहू के साथ और स्त्री के लिये पुत्र, पिता और दामाद के साथ गमन । श्रतिबल - वि० प्रबल । प्रचंड । श्रतिमुक्त - वि० विषयवासना-रहित । २६ श्रतीस श्रुतिरंजन - संज्ञा पुं० बढ़ा चढ़ाकर कहने की रीति । श्रत्युक्ति | प्रतिरथी-संज्ञा पुं० वह जो अकेले बहुतों के साथ लड़ सके । अतिरिक्त क्रि० वि० सिवाय । अलावा । छोड़कर | वि० १. शेष बचा हुआ । २. अलग । जुदा । भिन्न । प्रतिरोग - संज्ञा पुं० यक्ष्मा । क्षयी । प्रतिवाद - संज्ञा पुं० १. सच्ची बात । २. कडुई बात | ३. डींग । शेखी । श्रतिवृष्टि - संज्ञा स्त्री० छः ईतियों में से एक । अत्यंत वर्षा । अतिशय - वि० बहुत । ज्यादा । श्रतिशयेक्ति-संज्ञा स्त्री० एक अलंकार जिसमें किसी वस्तु को बहुत बढ़ा- कर वर्णन करते हैं । अतिसंघ-संज्ञा पुं० प्रतिज्ञा या श्रज्ञा का भंग करना । प्रतिसंधान-संज्ञा पुं० विश्वासघात । धोखा । अतिसार - संज्ञा पुं० एक रोग जिसमें खाया हुआ पदार्थ अंतड़ियों में से पतले दस्तों के रूप में निकल जाता है। अतींद्रिय - वि० जिसका अनुभव इंद्रियों द्वारा न हो । गोश्वर । अव्यक्त । श्रतीत- वि० १. गत । बीता हुआ । २. जुदा । अलग । ३. मृत | मरा हुआ । क्रि० वि० परे । बाहर | संज्ञा पुं० संन्यासी । यति । साधु । श्रतीव - वि० बहुत । अत्यंत । तीस-संज्ञा पुं० [सं०] एक पहाड़ी