पृष्ठ:बीजक मूल.djvu/२

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[३] HANA पर कड़ी आलोचना को है "वै खसी ये गाय कटावें धादहि जन्म गॅवाया और 'गाय वधे ते तूरुरु कहिये इनते वै क्या छोटे सय जीवों पर दया रसना जो मूल धर्म है दोनों ने छोड़ दिया जैसे- "हिन्दू की दया मेहर तुरुकन की, दोनों घट सो त्यागी "वै हलाल वे झटका मार माग दुनों घर लागो पढ़ लिख कर भी मसलो राम और खुदा को नहीं पहचाना जैसे-"पडित वेद पुरान पढ़े सव, मुसलमान कुराना । कहहिं कपीर दोउ गये नर्क में, जिन हरदम रामहिं ना जाना" झूठी भक्ति और अन्ध विश्वास पर मापके विचार जैसे-"कविरन भक्ति विगारिया, कंकर पत्थर धोया तथा "माटी के करि देवी देवा, काटि२ जिव देइया जी और केतनों मनावो" . पाँव परि, केनों मनावो रोय । हिन्दू पूजे देवता, तुरुक न काह होय" इत्यादि। . इस अन्य का मुख्य विषय जिश सुना को ज्ञान प्राप्त कराकर ___ सम्पूर्ण बन्धनों से जीते जी मुक्त करना है जैसे-"वन्दे करिले मापु ' निवेरा । आपु जियत लखु मापु ठौर करू, मुये कहाँ घर तेरा इसी 'कारण "यना बनाया मानवा. विना बुद्धि ये तूल मादि पदों से • अशानियों को ज्ञान प्राति के निमित्त सच्चे गुरु करने की मावश्यकता पतलाते हुए कहा है जैसे-"ताकी पूरी फ्यों परे,जाके गुरु न लखाई । ई घाट' अथवा जाको सद्गुरु न मिला, व्याकुल दुहुँ दिशि धाय" इस प्रकार पारसी सन्तों की संगति से प्राणी अपने स्वरूर में स्थिर हो जाता है जैसे-"साधु मगति सोजि देम्बहु, बहुरि उलटि समाय" 1 और अंत में जोर देकर कहते हैं कि "कर खोज कबहूँ न मुलाई सन्तों की शरण में अपने पद (निज स्वरूप) का सोज करते एं। से मनुप्य की म्रम में नहीं पड़ता। साहेव कहते हैं, मूल वता तुम्हारे पास ही है भटकने की आवश्यकता नहीं जैसे- खाजत पल्पी गया,यटहि माहिं मो मरण और "उद्या पाहि पति पासा" .