पृष्ठ:बुद्धदेव.djvu/१०३

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गौतम बुद्ध कहलाए। कहते हैं कि चंद्रमा में अमृत रहता है और वह अपनी किरणों से उसे बरसाता है। पर यह बात कवियों की कविता और पुराणों की गाथा में ही थी। किसी ने कभी आकाश से अमृत की धारा बरसते न देखी और न सुनी ही। पर यह आषाढी पूर्णिमा सचमुच एक ऐसी राताथी जिस में गौतम बुद्ध के ऊपर बोधि. रूपी अमृत की वृष्टि हुई। वे बुद्ध हुए और अपने इस लब्ध ज्ञानामृत से सहस्रो प्यासी. आत्माओं को तृप्त करके उनको शांति प्रदान की। . .. ... . उस रात के पहले पहर में गौतम को दिव्य चक्षुः उत्पन्न हुए . और उन्होंने सम्यक दृष्टि लाभ की । इन दिन्य चक्षुओं के प्राप्त. . होने से उन्होंने ऊँचे नीचे, सुवर्ण, दुर्वर्ण, सुगत, दुर्गत सब प्राणियों । को देखा कि बहुतेरे लोगों को मानसिक, वाचिक और कायिक पापों से आगे धर्म-विरोधी मिथ्या दृष्टि, मिथ्या कर्म और मिथ्या धर्म प्राप्त हुआ है जिससे वे मरण से अपाय, दुर्गति, विनिपात . आदि नरकों में पड़कर दुःख भोग रहे हैं। और अनेक लोगों को मानसिक, वाचिक और कायिक सुचरित से सम्यग्दृष्टि, सम्यक्कर्म और सम्यधर्म प्राप्त हुआ है जिनसे वे सुगति स्वर्ग लोक में सुख भोग रहे हैं। उन्हें सब प्राणी इस संसार के प्रवल कर्मबंधन में जकड़े हुए दिखाई पड़े। इसे बौद्ध लोग दिव्य-चक्षुज्ञान-दर्शन-विद्या कहते हैं। इससे गौतम की आँखों के सामने से तमं का आवरण दूर हो गया और उन्हें आलोक ज्ञान प्राप्त हुआ। अब दूसरा पहर आया । इस समय उन्हें पूर्वानुस्मृतिज्ञान का दर्शनं प्राप्त हुआ।