पृष्ठ:बुद्धदेव.djvu/११०

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संभाषण तक नहीं करता था। इसी लिये लोगों ने उसका नाम 'हुंक' रख दिया था । गौतम ने उसके पूछने पर कहा- यो ब्राह्मणे वा कितपापधम्मो निहुँको निक्कसावो यवतो धम्मेन सो (ब्राह्मणो) ब्रह्मवादवदेय्य । यस्सुस्सदानस्थि कुहिंच लोकेति । जो ब्राह्मण पाप-धर्म नहीं करता, किसी को हूँ हूँ नहीं करता और कपायरहित यतात्मा है, जो वेदांतज्ञ है और जिसने ब्रह्मचर्य पालन किया है, जिसको इस लोक में कोई विचलित करनेवाला नहीं है, वही ब्राह्मण ब्रह्मचर्य का उपदेश कर सकता है। ____छठे सप्ताह में वह अजपाल से चलकर दक्षिण ओर मुचालिंद हद पर गए हैं। यह मुचलिंदगद महाबोधि वृक्ष से दक्षिणपूर्व के कोण में इक्यावन धनु पर.था। यहाँ एक छोटा सा तालाव था जिसके किनारे मुचकुंद का एक पेड़ था। पाली में मुचकुंद को मुचलिंद कहते हैं और इसी लिये इस हद का नाम मुचलिंद-हद वा मुचलिंद-दह था न यहाँ सात दिन तक मूसलाधार पानी वरसा और -

  • ललितविस्तर का मत है कि प्राचर्य रमाह में गौवन बुद्धमुपलिंद

नागराज के भवन में रहे और इस समाह में वहाँ यहा पानी घरमा और नागराजने स्वयं प्राकर अपने मन की छाया उनके सिर पर करके उन्हें पानी से बवाया। युद्धस्पयोधिष्ठानं शक्नुवादक तुमन्यया । पीयुगस्यानिवेदयन्तमित्ययं स्यातं अनेः । सर्व पौराषिर्फ कार्य करिष्यति बशामवन । चु०७