पृष्ठ:बुद्धदेव.djvu/१३०

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( ११७ ) यश के ग्रह त्याग कर संन्यास ग्रहण करने पर उसके चार मित्रों को जिनके नाम विमल, सुबाहु, पुण्यजित और गवांपति थे, वड़ा विस्मय हुआ। वे लोग अपने मन में कहने लगे-"यश सर्वेश्वर्या- संपन्न होने पर भी क्यों घर छोड़कर परिव्राजक हो गया।? अवश्य परिव्राजक होने में उसने कोई अलौकिक लाभ देखा होगा।" यह विचार कर वे चारों संसार से विरक्त हो भगवान् बुद्धदेव के पास पहुँचे और भगवान् का उपदेश ग्रहण कर परित्राजक हो गए। इसके बाद ही धोरे धोरे काशी के पचास और मनुष्य भगवान् बुद्धदेव के पास क्रमशः आ आकर उनके धर्मोपदेश सुनकर परि- ब्राजक हो गए । इस प्रकार काशो में वर्षा ऋतु में रह भगवान् बुद्ध- . देव ने पाँच पंचवर्गीय भितु, नालक, क्या यश और उसके चार मित्र और पचास अन्य नागरिकों को-सब मिलकर एकसठ मनुष्यों को-परित्राजक बनाया और इसके अतिरिक्त सैकड़ों गृहस्थों को धर्मोपदेश दिया । कहते हैं कि भगवान् ने यहीं "संघ" का संगठन किया और यहीं से 'बुद्ध, धर्म और संघ' तीनों अंग बुद्ध धर्म के परिपूर्ण हुए जो बौद्धधर्म के 'रल-त्रय' कहलाते हैं। ___ चातुर्मास्य बीत जाने पर भगवान् बुद्धदेव ऋषिपतन से उरु. वेला जाने को उद्यत हुए और आश्विन मास की पूर्णिमा को अपने शिष्यों को बुलाकर उन्होंने सब को यह आज्ञा दी-'हे भिक्षुओ! आप लोग चारों दिशाओं में जाकर संतप्त-हृदय संसारी जीवों को मोक्ष का उपदेश कीजिए । पर एक बात स्मरण रखिए कि सब लोग अकेले अकेले एक एक मार्ग से जाइए और कहीं दो आदमो एक