पृष्ठ:बुद्धदेव.djvu/१२९

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( ११६ ) वहाँ उसे भगवान् बुद्धदेव एक वृक्ष के मूल में योगासन लगाए बैठे मिले । यश " उपद्भुतं वत भो ! उपरसठं वत भो !" अर्थात् “घोर उपद्रव है, कठिन आपत्ति है ' कहता चला जा रहा था कि भगवान् ने उसे जाते हुए देखकर बुलाया और कहा " यश ! सच है, बड़ा उपद्रव हो रहा है। आओ, हम तुम्हें धर्म का उपदेश देंगे।" गौतम की वात सुन यश उनके पास गया और अभिवादन कर बैठ गया। भगवान् ने उससे दानकथा, शीलकथा, खर्गकथा आदि कहकर धर्मचक्र का उपदेश किया। यश की आंतरिक आँखें खुल गई। उसने उनका धर्म स्वीकार कर परिव्राज्य ग्रहण कर लिया । दूसरे दिन यश का पिता अपने पुत्र के निकल जाने से अत्यंत दुःखी हो उस को खोजने निकला और खोजता हुआ मृगदाव में भगवान् बुद्धदेव के आश्रम में पहुँचा । भगवान् ने उसे भी यश की भाँति दान, शील आदि के उपदेश देकर उसके अंतःकरण में भी वैराग्य का वीज बोया । यश के पिता को भी ज्ञान हो गया। जब पिता ने यश को घर चलने के लिये कहा, तो वह भगवान् का मुँह देखने लगा। गौतम ने कहा " सेठ ! यश को तो विराग हो गया; उसने धर्म को जान लिया।" पिता ने उसकी यह दशा देख महात्मा बुद्धदेव और यश दोनों को अपने घर भोजन करने के लिये आमंत्रित किया। दूसरे दिन गौतम बुद्ध यश को साथ लेकर उसके पिता के घर भिक्षा के लिए आए और उन्होंने भिक्षा ग्रहण कर उसके परिवार को शील आदि का उपदेश किया और वे अपने आश्रम को लौट गए। .