पृष्ठ:बुद्धदेव.djvu/१५६

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(१७) तृतीय चातुर्मास्य चातुर्मास्य के समीप आ जाने से भगवान बुद्धदेव ने अपने शिष्यों समेत कपिलवस्तु से प्रस्थान किया। मार्ग में अनामा नदी के किनारे अनुपिय नामक आम्रवन में ठहरे थे कि कपिलवस्तु के छः राजकुमार जिनका नाम अनिरुद्ध, आनंद, भद्रिय, किमिल, मगु और देवदत्त था, उपालि नामक नापित के साथ वहाँ आए और भगवान् के उपदेश सुनकर उन्हों ने ब्रह्मचर्य महण किया । कहते हैं कि कुमारों के पहले उपालि को लोगों ने शिष्य होने के लिये वाध्य किया जिसमें शाक्यकुमारों का जाति-अभिमान जाता रहे। इन शिष्यों में अनिरुद्ध दिव्यचक्षु हो गया और उपालि विनयपिटक का आचार्या तथा आनंद पिटक का संग्रह करनेवाला हुआ।.. .. __राजगृह में पहुँचकर बुद्धदेव ने वेणु वन में अपना तृतीय चातुर्मास्य किया। इसी चातुर्मास्यमें उन्होंने महाकश्यप को अपना शिष्य किया। यह सहाकश्यप राजगृह के पास के महातीर्थ नामक गाँव का रहनेवाला था। इसके पिता का नाम कपिल था। ऋपिन मगध में अत्यंत प्रसिद्ध विद्वान् और धनधान्यसंपन्न था। उसका एक ही पुन्न था जिसका नाम पिप्पल था और जो अपने पिता ही के समान विचार-बुद्धि-संपन्न.था। पिप्पल का विवाह मद्रास को एक सुंदरीसे हुआ था जिसका नाम भद्रकापिलानी था। एक दिन मिप्पता अपने घर पर बैठा था और उसके नौकर चाकर कोठी में से चावल निकाल निकालकर धूप में सुखाने के लिये आँगन में डाल रहे