पृष्ठ:बुद्धदेव.djvu/१९३

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(२८) चौदहवाँ चातुर्मास्य . जाड़ा बीतने पर भगनान बुद्धदेव राजगृह से श्रावस्ती को चले। श्रावस्ती में महाराज प्रसेनजित् के पुरोहित के घर एक लड़का उत्पन्न हुआ था जो बड़ा ही क्रूर और हिंसक था। वह किसी तांत्रिक प्रयोग के लिये पुरुषों की तर्जनी उंगली काट काटकर संग्रह किया था और उन उंगलियों की वह एक माला बनाकर पहने रहता था। इसी कारण लोग उसे अंगुलिमाल कहा करते थे। अंगुलिमाल के अलग- चार से श्रावस्ती की प्रजा बड़ी दुखी थी। जब भागवान् बुद्धदेव श्रावस्ती में पहुँचे,तब वहाँ चारों ओर अंगुलिमाल के अत्यचार और राक्षसी व्यवहार की चर्चा फैली हुई थी। स्वयं महाराज प्रसेनजित् इसके अत्याचारों से अत्यंत क्रुद्ध थे और उन्होंने उसे पकड़ने की आज्ञा दी थी, पर वह पकड़ा नहीं जाता था। एक दिन भगवान बुद्धदेव को भिक्षा के लिये श्रावस्ती के आप पास के किसी ग्राम में जाते हुए देख अंगुलिमाल ने उन्हें पुकारकर कहा-“हे भिक्षु ! खड़े रहो।" भगवान बुद्धदेव ने उसकी बात सुन कर कहा--"मैं ठहरा हूँ।" यह कहकर वे आगे बढ़े, पर अंगुलिमाल । ने जब देखा कि वे कहते तो हैं कि मैं ठहरा हूँ पर वे आगे बढ़ते जा रहे हैं, तब उसने फिर कहा-'भिक्षु ! आप मिथ्या कह रहे हैं कि आप ठहरे हैं, आप तो भागे जाते हैं।" भगवान् ते उसकी यह बात सुनकर कहा-"अंगुलिमाल ! मैं सच कहता हूँ । इस संसार में