पृष्ठ:बुद्धदेव.djvu/१९७

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( १८४ ) सकेंगे तो मैं आपका हृदय फाड़कर आपको मार डालूंगा। भग- वान् बुद्धदेव ने कहा-"यक्ष! मारने की तो बात ही और हैं। मुझे मारनेवाला संसार में कोई उत्पन्न ही नहीं हुआ। अस्तु, तुम प्रश्न करो, मैं तुम्हें उत्तर दूंगा।" यक्ष-"पुरुप के लिये कौन श्रेष्ठ धन है ? सुचीणं सुख देनेवाला कौन है ? संसार में स्वादुतम कौन वस्तु है ? किस प्रकार का जीवन व्यतीत करनेवाला श्रेष्ठ (जीवित) है ?" ____ गोतम-"श्रद्धा पुरुप के लिये श्रेष्ठ धन है, धर्म सुचीर्ण सुख देनेवाला है, सत्य संसार में स्वादुतम पदार्थ है, प्रज्ञा से जीवन निर्वाह करनेवाला हो संसार में अप्ठ (जीवित ) है। . यत-" ओघ को किससे भर सकते हैं ? अर्णव को किससे पार कर सकते हैं ? दुःख का नाश कैसे कर सकते हैं और परिशुद्धि किससे होती है ?"

  • यस-फिंध वित्तपुरियस सेढ किंमू सुधीपणो सुखमा वदाति ।

किये गादुतर सानं, फर्य जीपि पीपितमाहु से। गौतम -सद्धीपयि पुरसमस सेल, घी सुपीएणो सुखनावहाति । सध्यं ये सादुतरं रसान, पाजीवि जीवितमाहु से यक्ष-कर्म सुतरती श्रोध, फर्य सुतरति धारण । कर्य सुदुक्खं अपेति फर्य सुपरिमुग्मति ॥ • गौतम-सद्वार वरती सोपं अंपमादेन अपवयं । पिरियेन दुपखं शवेति परमाव परिसुमति ।